महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, May 30, 2014

एक नई सत्‍याशा


ज बहुत इच्‍छा हो रही है कि पृथ्‍वी के बीचोंबीच एक बड़ा ऊंचा टीला हो और मैं उस पर चढ़कर अन्‍धे प्रगतिवादियों पर जोर-जोर से हंसूं। दिल्‍ली और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आए आज के अंधड़ में जिस तरह बड़े-बड़े, मोटे-मोटे पेड़ धरती से उखड़कर यहां-वहां गिरे, भवन निर्माताओं के निर्माणाधीन भवनों के ऊपरी तल भरभराते हुए गिर गए, गर्मी से तप्‍त अपराहन समयकाल अन्‍धेरे में डूब गया इस स्थिति में बात-बात पर खुद को तीस मार खां समझता आदमी अब भी असहाय महसूस नहीं कर रहा था। वह तूफान के प्रत्‍यक्ष असर से बचकर सुरक्षित था, और फिर भी कहे जा रहा थाअच्‍छे दिन आ गए हैं। उसे यह चिन्‍ता नहीं थी कि इस प्रकृति कोप से कितने व्‍यक्ति मर गए। कितनों के शरीर पर बड़े घाव हो गए। कितनों का घरबार बर्बाद हो गया। अपने जैसे व्‍यक्ति के दुख से पीड़ित होने के बजाय वह बके जा रहा थायह अच्‍छे दिनों की शुरुआत है।
अंधड़ से उखड़ा विशाल वृक्ष


समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि इस तरह के व्‍यक्ति नमो विरोधी हैं। वे देश-दुनिया के पिछले सौ से अधिक वर्षों के शासकों की औद्योगिक-वैकासिक-प्रगतिवादी नीतियों के कारण कुचली गई प्रकृति की प्रलंयकारी प्रतिक्रिया को भी नमो से जोड़ कर देख रहे हैं। अरे हद है यार कुण्‍ठा की।
     और नरेन्‍द्र मोदी के साथ दैवीय शक्ति भी जैसे एक खेल, खेल रही है उसका धैर्य और साहस देखने के लिए। गुजरात में मुख्‍यमन्‍त्री बनते ही भूकम्‍प की त्रासदी और गोधरा घटना झेल चुका व्‍यक्ति अपने अन्‍दर असीम धैर्य जमाए हुए है। उसे उसके संकल्‍प से कोई विलग नहीं कर सकता। उसने गुजरात को इतने बड़े भूकम्‍प के बाद हुई हानि से उबारकर भारत में सबसे शक्तिशाली राज्‍य के रूप में स्‍थापित किया। देश-दुनिया में सन्‍तुलित विकास को पहचानने वालों ने उसे उसके काम के लिए सराहा और उससे भारत देश को भी इसी प्रकार संचालित करने की आशा पाली।
30.05.14 को सायं पांच बजे दिल्‍ली/एनसीआर
आज जनसमर्थन के बलबूते वह देश को संचालित करने के लिए प्रधानमन्‍त्री बन चुका है। अब प्रकृति एक बार फिर उसकी परीक्षा ले रही है। ईश्‍वर एक बार पुन: उसका धैर्य परखने के लिए खड़ा है। आशा है वह अपने विरोध में खड़े व्‍यक्ति और प्रकृति दोनों को भी एक दिन अवश्‍य जीत लेगा।
     नवशासन की शुचिता से देश में नई धारणाएं विकसित होंगी। चरित्र की शक्ति किसी को कहां से कहां पहुंचा सकती है। यह नरेन्‍द्र मोदी को देखकर भलीभांति समझा जा सकता है। इसलिए अब वर्षों से गिरे हुए राष्‍ट्रीय चरित्र को उठाने के लिए देशवासियों को एक नया सहारा मिला है, जिसे यथासम्‍भव सहयोग दिए जाने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। अंग्रेजों की अकादमिक शिक्षा में वह शक्ति नहीं है, जो भारतीय स्‍वाध्‍याय संस्‍कृति में रही है। यह संस्‍कृति केवल चरित्र के आधार पर फलीभूत होती है। इसलिए यह ज्येष्‍ठ माह भारतीय भूभाग ही नहीं अपितु संसार के लिए भी एक नई सत्‍याशा लेकर आया है। आवश्‍यकता इसे विशुद्ध हृदय से अपनाने की है।

Thursday, May 22, 2014

मोदी लहर का असर

सोलहवीं लोकसभा का चुनाव अद्वितीय था। भाजपा के प्रधानमन्‍त्री पद के प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र मोदी की चुनावी रैलियां, सभाएं, भाषण भारतीय जनमानस को एक नई दिशा दे गए। उनके भाषणों में विरोधी दलों या उनके नेताओं के बारे में जो कुछ कहा गया, प्रत्‍यक्ष रूप से वह सही नहीं लगता। पर ध्‍यान देनेवाली बात ये है कि उन्‍होंने जो कुछ भी विरोधी नेताओं के बारे में कहा है, वह उनकी करनी के हिसाब से सही था। आम भारतीय जनता पिछले दस साल से साधारण जीवन जीने के लिए भी जिस तरह के कठिन हालातों से जूझ रही है, वह सब संयुक्‍त प्रगतिशील गठबन्‍धन सरकार की नीतियों के कारण ही हुआ।


दस साल एक आदमी की जिन्‍दगी को बहुत ज्‍यादा बदल देते हैं। और अगर ये साल सरकार, समाज के भ्रष्‍टाचार में ही व्‍यतीत हुए हों तो आम जनता की विचारशक्ति भी भ्रष्‍टाचार के इस दुष्‍चक्र में फंसे बिना कैसे रह सकती थी। क्‍योंकि विचारधाराएं चाहे वो अच्‍छी हों या बुरीं शासन के स्‍तर से ही पूरे समाज में प्रसारित होती हैं। इस बीच हमारे शासक लोकतान्त्रिक सत्‍ता के नाम पर अनुचित काम करने लगे। राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या के एक बड़े प्रतिशत को अपने अनुचित कामों के प्रति मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसे बेढंगी व्‍यवस्‍था से राजी करने लगे। ऐसे में राष्‍ट्रीय राजस्‍व में विभिन्‍न करों के रूप में अपना योगदान देता हुआ आ रहा भारतीय मध्‍यमवर्ग सत्‍तारूढ़ दल की नजर में अनदेखा हो गया। क्‍या सत्‍तारूढ़ दल के रूप में कांग्रेस की इस वर्ग के प्रति कोई जिम्‍मेदारी नहीं थी। पिछले दस वर्षीय राजकाज में जीवन के मूल अधिकारों के साथ-साथ इस वर्ग से कई सौतेले राजनीतिक निर्णयों के माध्‍यम से हिन्‍दुत्‍व की इसकी वैदिक, पै‍त्रक संकल्‍पना छीनने की गोपनीय कोशिशें भी हुईं। महंगाई, भ्रष्‍टाचार, बेरोजगारी से तो यह वर्ग जैसे-तैसे सामन्‍जस्‍य स्‍थापित करता हुआ आया ही है, लेकिन उसके पारम्‍परिक जीवन को भी उससे छीनकर उसे कहीं का न छोड़ने की जो राजनीतिक नौटंकी हुई, उसने भारतवर्ष में एक नई लहर पैदा की। इसकी परिणति आज हम नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने के रूप में देख रहे हैं।
नरेन्‍द्र मोदी किनारे पर पटक दिए गए ऐसे बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के लिए एक राजनीतिक व्‍यक्ति बनकर ही नहीं आए, बल्कि वे समाज के सभी वर्गों के जीवन के लिए जरूरी उपक्रम विकास के महापुरुष के रूप में भी उभरकर आए हैं। उनके पास गुजरात राज्‍य में मुख्‍यमन्‍त्री के रूप में कार्य करने का दस-बारह वर्षों का प्रशासनिक अनुभव है। उनके पास राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर किए जानेवाले कार्यों, व्‍यापारिक सौदों का एक सर्वथा नया दृष्टिकोण है। भारत देश के अन्‍दर गुजरात राज्‍य में बनाई गईं उनकी वैकासिक नीतियां केन्‍द्र की संप्रग की नीतियों से कहीं गुणा अधिक समुचित और कल्‍याणकारी थीं। इसके परिणामस्‍वरूप गुजरात में हुए अनेक विकास कार्य, विदेशी धननिवेश अभूतपूर्व हैं। और सबसे बढ़कर है उनका वह दृष्टिकोण जो विकास के दुष्‍प्रभावों पर केन्द्रित है। वे विकास के कारण होनेवाली प्रकृति की हानि पर भी दूरदृष्टि टिकाए हुए हैं। इस बारे में उनकी योजना शायद पश्चिमी नीति-नियन्‍ताओं से भी कारगर हो, ऐसी आशा की जानी चाहिए।
इन परिस्थितियों में कई लोग आप पार्टी की देशव्‍यापी हार के लिए संवेदनाएं बटोरने से बाज नहीं आ रहे। वाराणसी संसदीय क्षेत्र से नरेन्‍द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे केजरीवाल को हार का सामना करना पड़ा। पंजाब को छोड़कर आप को कहीं भी विजय नहीं मिली। यहां तक कि जिस दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में उसे 28 सीटें मिली थीं, इस बार वहां भी उसका मैदान साफ रहा।
मोदी विरोधियों का कहना है कि यदि केजरीवाल दिल्‍ली के मुख्‍यमन्‍त्री पद से त्‍यागपत्र नहीं देते तो दिल्‍ली, राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कई लोकसभा सीटें जीत जाते। जबकि सच्‍चाई ये है कि मोदी की लहर में वे दिल्‍ली में मुख्‍यमन्‍त्री रहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते थे। दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने पर केजरीवाल ने कांग्रेस से समर्थन नहीं लेने का बड़ा वचन दिया था। कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाकर उन्‍होंने वह वचन तोड़ दिया। विधानसभा चुनाव में कई सीटें जीतने से पहले केजरीवाल के निशाने पर कांग्रेस पार्टी और इसका भ्रष्‍टाचार था। उससे समर्थन लेकर सरकार बनाने के बाद उनके निशाने पर मोदी आ गए। भ्रष्‍टाचार के लिए कांग्रेस और भाजपा की तुलना करने से पहले वे इतना भी नहीं सोच पाए कि दशकों से देश में जिस पार्टी का शासन रहा है, भ्रष्‍टाचार तो उसी की देन है। भाजपा को भ्रष्‍टाचार में कांग्रेस के समकक्ष लाने के लिए उन्‍हें कम से कम भाजपा के साठ सालों के शासन का इंतजार तो करना ही पड़ेगा। तब ही वे दोनों राष्‍ट्रीय दलों के भ्रष्‍टाचार या विकास को लेकर तथ्‍यपरक तुलना कर सकेंगे। और पूर्ण विश्‍वास के साथ कह सकते हैं कि यदि भाजपा को नरेन्‍द्र मोदी जैसे व्‍यक्ति साठ साल तक देश सेवा के लिए मिलते रहे तो भ्रष्‍टाचार शब्‍द भारत ही नहीं संसार के शब्‍दकोश से भी मिट जाएगा।
     छोटे राजनीतिक दल, क्षेत्रीय क्षत्रप अभी भी भारतीय जनमानस को नहीं समझ पा रहे हैं। आनेवाले राज्‍य विधानसभा चुनावों में भी मोदी लहर का असर रहेगा। हो सकता है आनेवाले समय में भाजपा के दम पर लोकतान्त्रिक प्रणाली ही बदल जाए। मतलब विकास के रथ पर सवार सत्‍तारूढ़ दल हमेशा के लिए भारतीय लोकतन्‍त्र  पर स्‍थापित हो जाए। ऐसे में आनेवाले समय में आप, सपा, बसपा, लोद, जदयू जैसे छोटे दलों का अस्तित्‍वहीन होना तय है। पश्चिम बंगाल में भाजपा चौदह लोकसभा सीटों पर रनर अप रही है। इससे ममता बनर्जी के माथे पर अभी से बल पड़ने शुरू हो गए हैं। केरल, तमिलनाडु, आन्‍ध्र प्रदेश, जम्‍मू एवं कश्‍मीर, असम जैसे राज्‍यों में भाजपा का  संसदीय उदय नए भारत की कहानी की प्रस्‍तावना है। आनेवाले समय में नरेन्‍द्र मोदी  के सुचारू संचालन से भाजपा लोकसभा के साथ-साथ सभी राज्‍यों की विधानसभा सीटों पर भी विजय प्राप्‍त करेगी।

Monday, May 19, 2014

ब्‍लॉग का नया शीर्षक

मैं, मेरे ब्‍लॉग के सम्‍पर्क में रहनेवाले सभी मित्रों को सूचित करता हूँ कि मैंने अपने ब्‍लॉग का शीर्षक (हथेली में तिनका छूटने का अहसास) से बदलकर (हरिहर) कर लिया है।

Tuesday, May 6, 2014

राजनीतिक नवदृष्टि

स आलेख के माध्‍यम से अपनी व्‍यक्तिगत दृष्टि बदलने की कोशिश की है। अपने सिद्धान्‍त एक किनारे रख दिए हैं। दिल-दिमाग मेरा है, पर सोच-समझ व विचार मेरे नहीं हैं। मैं अपनी नजर में जहां तक जो कुछ भी देख पा रहा हूं वह सब देखकर केवल तटस्‍थ बना हुआ हूं। तटस्‍थ बनने में बड़ी राहत है। किसी विशेष विचारधारा या उसके राजनीतिक दल के पक्ष में बने रहने का भाव कचोटता है। व्‍यक्ति या राजनीति या इनसे संचालित समाज सब की अपनी-अपनी विचारधाराएं थीं। विचारधाराओं का जन्‍म अच्‍छाई व भलाई के लिए ही हुआ होगा, पर कालान्‍तर में विचारधाराएं अगर मानवीयता से अलग हुईं और खुद में उलझ कर अनसुलझी हो गईं तो यह मानवीय रिश्‍तों की अपरिपक्‍वता के कारण ही हुआ।
     श्रेष्‍ठ पारिवारिक जीवन जब सम्‍बन्‍धों की कमजोरी के कारण दरकने लगे तो पंचायत-समाज का निर्माण हुआ। पंचायत-समाज ने पारिवारिक सम्‍बन्‍धों की कमजोरी को सुधारने की जिम्‍मेदारी तो ले ली, लेकिन वह भी अपने निर्धारित मानकों के उल्‍लंघन में फंसता चला गया। फलस्‍वरूप लोकोपचार की नीति राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बनाने की कोशिश हुई, जिसके लिए लोकतन्‍त्र नामक शब्‍द आया। और इस लोकतन्‍त्र को संभालने के लिए सरकार बनी। यह पूरी प्रक्रिया केवल पिछले साठ-पैंसठ सालों से ही नहीं है। यह मनुष्‍यों के बीच परस्‍पर व्‍यापारिक लेन-देन होने के समय से ही शुरू हो गई होगी, ऐसा विश्‍वास के साथ कहा जा सकता है। क्‍योंकि परिवार को छोड़कर पंचायत से लेकर संसदीय लोकतन्‍त्र तक जो भी सामाजिक गठन हुआ है वह केवल पारिवारिक, मानवीय सम्‍बन्‍धों की चिन्‍ता के कारण नहीं हुआ। यह व्‍यापारिक गतिविधियों को सुगमता से चलाने के लिए किया गया।
     आज परिवार, पारिवारिक सदस्‍य और पारिवारिक सम्‍बन्‍ध लोकतन्‍त्र के नाम पर चल रही व्‍यापारशाला के अन्‍दर घुटने के लिए बन्‍द हो गए। परिवार अब केवल जीवन सम्‍बन्‍धी परस्‍पर जरूरतों के अड्डों में बदल गए हैं। पारिवारिक मूल्‍यों में व्‍यापार से पनपी सोच घुस गई है, जो दीमक की तरह सम्‍बन्‍धों को खाए जा रही है।
     इन स्थितियों में धर्म, जाति, राजनीतिक दल के रूप में अनेक विचारधाराओं की बात अत्‍यन्‍त बेमानी है। वास्‍तव में आज पारिवारिक मूल्‍यों, संस्‍कृति के बिना पलने-बढ़नेवाला मानव मात्र मानवीय उत्‍पाद में बदल रहा है। यह उत्‍पाद समूह रूप में एक दल विशेष की विचारधारा की बात कैसे कर सकता है, क्‍योंकि विचारधाराओं को पोषित करनेवाली परिवार इकाई संस्‍कृत, मूल्‍य विहीन जो हो गई है। जब हम परिवार में एक होकर नहीं रह पा रहे हैं तो समाजगत, राजनीतिक दलगत एकता कैसे संभव हो सकती है! और जब यह संभव नहीं तो देश का विकास और लोगों का कल्‍याण जैसे मानक कैसे तय होंगे?
     लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत बंटी अनेक विचारधाराओं को देखने के लिए जो तटस्‍थ दृष्टि मैंने अपनाई है सबको वही दृष्टि अपनानी होगी। इससे हममें यह विवेक जागेगा कि हम मानवीय मूल्‍यों के पतनकाल में सबसे कम पतित लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के पैरोकार को चुन सकें। परस्‍पर सम्‍मान और भरोसा जब पिता-पुत्र, माता-पुत्री, भाई-बहन या पति-पत्‍नी में ही नहीं रहा तो यह हमें लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था संभालनेवाले राजनैतिक दलों में कैसे परिलक्षित होगा!
     यहीं इसी बिन्‍दु पर हमें किसी दल या वर्ग विशेष के प्रति निरपेक्षता का भाव उत्‍पन्‍न करना होगा। अपनी अन्‍तर्दृष्टि जागृत करके भारतीय राजनीति को सालों पुरानी सोच के बजाय एकसूत्र में एक नई नजर से देखना होगा।

Thursday, May 1, 2014

जीवन बना जंजाल

हां रहता हूं वहां रहते हुए आगामी जुलाई में पूरे पांच वर्ष हो जाएंगे। इन वर्षों में अपने रहने के स्‍थान से देश, दुनिया, राज, धर्म, मानवीय सम्‍बन्‍धों आदि विषयों के जो भी समाचार मिले या मिल रहे हैं, उनकी जानकारी से व्‍यक्तित्‍व केवल कुण्ठित ही हुआ। पिछले कुछ वर्षों में जीवन का ताना-बाना बड़ा विचित्र हो गया। जीवन के मूल स्‍वभाव के बारे में केन्द्रित होने की सोचो तो मन-मस्तिष्‍क पर आडम्‍बरपूर्ण शासकों द्वारा चलाई जा रही दुनिया के कंटीले हस्‍तक्षेप होने शुरू हो जाते हैं। चारों ओर जो मनुष्‍य दिखते हैं वे सभी मुझे प्रथम दृष्टि में मनुष्‍य प्रतीत ही नहीं होते। उनकी गतिविधियों पर गहरी निगरानी रखता हूं। ज्ञात होता है कि वे सभी संवेदना से सोचने की स्थिति में ही नहीं है। यदि उनमें से कोई संवेदनामयी तरीके से सोचता भी होगा तो उसकी सोच व्‍यावहारिक नहीं बन पाती। किसी की भी संवेदना परस्‍पर अभिवादन, प्रणाम, प्रेरणा, प्रोत्‍साहन करने जैसे मानवीय गुणों से भी वंचित रह जाए तो फिर ऐसी संवेदना का व्‍यक्तियों को परस्‍पर भान कैसे होगा! अधिकांश लोग असंवेदना, कठोर एकात्‍मकता में जकड़े हुए हैं। सुबह-सुबह देखता हूं पार्क में टहलते कुछ लोगों का टहलना केवल दूसरों को देखकर किया जानेवाला काम है। उन्‍होंने उड़ते-उड़ते सुना होगा कि सुबह टहलने से स्‍वस्‍थ होते हैं। इस बात के अतिरिक्‍त उन्‍हें सुबह टहलने का कोई अन्‍य दर्शन ज्ञात नहीं है। एक व्‍यक्ति को देखता हूं। वह पार्क में ऐसे घूमता है जैसे किसी ने उसे दण्‍ड देकर वहां भेजा हो। वह पार्क की पगडंडी को पत्‍थर दृष्टि से देखता हुआ किसी तरह कुछ चक्‍कर काटता है और फिर घर चला जाता है। वह पार्क के परिवेश में पेड़-पौधों, हवा, पक्षियों, पक्षियों की चहचहाहट, अन्‍य लोगों की उपस्थि‍ति से सीधे-सीधे अनजान रहता है। गर्दन नीचे किए हुए यंत्रवत पार्क में टहलता है। उसके जैसों की पार्क, पार्क के बाहर और यहां-वहां सब जगह भरमार है। आखिर ऐसे लोग मानव कैसे हो सकते हैं, यह सोचकर बड़ा आश्‍चर्य होता है।
आधुनिक जीवन के भीतर जैसे पुरातन जीवन अपने असंख्‍य दोषों के साथ बैठा हुआ है। लोग प्रगतिवाद की एक अन्‍धी लकीर को पार नहीं कर पा रहे हैं। उस पर आंख मूंदकर चल रहे हैं। उनमें इतनी विवेचना शक्ति नहीं कि वे सोच सकें कि उनके पास अपना एक मस्तिष्‍क है, जिसे अपने सुख और दुख के अनुसार सोचना चाहिए। लेकिन नहीं उनका मस्तिष्‍क संसार की व्‍यापारिक जरूरत के हिसाब से सोचता है। वे दुनियावी समाजवाद, प्रगतिवाद, आधुनिकवाद की आड़ में जड़ें जमाते धूर्ततावाद के अनुरूप विचार करते हैं। उनकी दृष्टि इतनी भी समझ नहीं रखती कि उनका जीवन-संघर्ष कुछ लोगों के ऐश्‍वर्य के लिए किया जानेवाला केवल एक ऐसा घर्षण है, जो कभी किसी आगामी समय में कहीं भी मूल्‍यांकित नहीं होगा।
ग्रामीण जीवन उजाड़ने के बाद जो बसेरा तैयार हुआ क्‍या उसमें सबके लिए यथोचित जीवन सुविधाएं हैं? शहर का निर्माण आखिर क्‍या सोच के किया गया? जब शहरीकरण के कारण जीवन के कुछ जरूरी संघटक जैसे जल, दूध, अनाज आदि लोगों को विशुद्ध रूप से प्राप्‍त नहीं हो पा रहे हैं तो इनकी भरपाई का कोई विनाशकारी विकल्‍प तैयार करना विज्ञान या समाज की दृष्टि से कैसे उचित हो सकता है! जो पदार्थ या सामग्री अपने मूल स्‍वरूप में उत्‍पादित नहीं होने की स्थि‍ति में विषसम बन जाए तो उसका व्‍यापारिक प्रसार करना क्‍या सही है? जो सही नहीं है, जो अनुचित है यह समयकाल उसी की स्‍थापना करने में लगा हुआ है। ऐसे में जीवन यदि जंजाल हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। और मानवीय जीवन को ऐसी जंजाली में फंसा देनेवाली सांसारिक व्‍यवस्‍था और इसके व्‍यवस्‍थापकों पर केवल खीझ और क्रोध ही आता है। बहुत लोगों को कहते सुनता हूं कि जमाना जितना आगे चला आया है वहां से वापस पीछे नहीं जा सकता। लेकिन बात पीछे जाने की नहीं बल्कि रुककर नई दृष्टि से सोचने की है। स्‍वार्थ को भूलकर, बच्‍चों के बारे में सोचकर प्रग‍तिवाद की अन्‍धी लकीर से अलग होने की है। क्‍या हम इतना भी नहीं कर सकते?