महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, May 25, 2015

अनुभूत किए गए कुछ अभिकथन


  • व्‍यवहार में अनावश्‍यक अभिनय करनेवाला व्‍यक्ति कुछ भी हो सकता है परन्‍तु संवेदनशील और विद्वान कदाचित नहीं हो सकता।
  • सच्‍चे सन्‍त जीवन मार्ग को प्रशस्‍त करते हैं ना कि अवरुद्ध। 
  • समझदार व्‍यक्ति कहावतों, लोकोक्तियों, पुराणों से प्राप्‍त ज्ञान को उपलब्धि नहीं मानते। पुरातन सूक्तियों का समग्र निचोड़, सम्‍पूर्ण ज्ञान समझदार व्‍यक्तियों में स्‍वाभविक रुप से विद्यमान होता है। आवश्‍यकता इसे कालखण्‍ड के अनुरुप प्रयोग करने की, अपने व्‍यवहार में उतारने की होती है। 
  • मनुष्‍य सम्‍पूर्ण ज्ञान केवल दो माध्‍यमों से ग्रहण कर सकता है, ये हैं प्रकृति और एकान्‍त।
  • एक मनुष्‍य लोकतान्त्रिक नियमों-कानूनों की जानकारी न रखने के बावजूद भी जीवन-पर्यन्‍त देश हित में समुचित बना रहता है तथा एक मनुष्‍य लोकतन्‍त्र का नेतृत्‍व करते हुए नियमों-कानूनों को बनाता है और उनके उल्‍लंघन का प्रतिनिधित्‍व भी करता है। क्‍या हमें ऐसा लोकतन्‍त्र चाहिए?
  • हिन्‍दी भाषा का उद्धार भारतीय समाज के प्रत्‍येक क्षेत्र में इसे व्‍यावहारिक बना कर ही हो सकेगा, ना कि हिन्‍दी दिवस आयोजित करने से।
  • दु:ख और पीड़ा में जो भावनाएं उभरती हैं, वही भावनाएं सुख के चरमोत्‍कर्ष के दौरान भी होनी चाहिए। तब ही मानवों के मध्‍य मानवोचित संवेदनाएं बनी रहेंगी।
  • जीवन को स्‍वस्‍थ, ऊर्जावान बनाए रखने का सबसे बड़ा स्रोत प्राकृतिक संगीत है। इसे सुनने से किसी वेदांत-ग्रन्‍थ, सन्‍त-महात्‍मा, गुरु के प्रवचनों को सुनने की आवश्‍यकता नहीं रहती।
  • मुद्रा को वस्‍तु-विनिमय का माध्‍यम इसलिए बनाया गया ताकि कृषकों, उद्यमियों को उनके परिश्रम का यथोचित मूल्‍य प्राप्‍त हो। इसलिए नहीं कि मुद्रा का मूल्‍य निर्धारण दलाल करने लगें और सारी अर्थव्‍यवस्‍था को ही चौपट कर दें।
  • विद्वानों, बड़ों का सम्‍मान उनकी जीवनोपयोगी बातों और सिद्धान्‍तों को सदैव व्‍यवहार में बनाए रखने से होता है ना कि तुच्‍छ स्‍वार्थों की पूर्ति हेतु चापलूसों की तरह उनके आगे-पीछे घूमने और मण्‍डराने से। 
  • वृद्धजनों की झुर्रियों और उनके नि:शक्‍त शरीर को देख कर उनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। बल्कि युवाओं को यह सोच कर उनकी सेवा करनी चाहिए कि कभी वे भी युवा, सुन्‍दर व जवान थे।
  • लेते हुए संकोच करनेवाला और देते हुए निसंकोच रहनेवाला ही विश्‍वासपात्र हो सकता है।
  • किसी के प्रति आकर्षित होने से पहले लाख बार सोचना चाहिए क्‍योंकि कालान्‍तर में वह हमारी दृष्टि को खटक भी सकता है।
  • नई विचारशक्ति प्राप्‍त करने के लिए मनुष्‍य को समस्‍त पूर्वाग्रहों को आंख मूंद कर स्‍वीकार करने के बजाय इनका व्‍यापक अध्‍ययन, विश्‍लेषण और विवेचन करना चाहिए।
  • नैतिक विचारों के व्‍यावहारिक एकीकरण से ही वर्ग-विभेद, सामाजिक मतभेद मिटाए जा सकते हैं।
  • जीवन एवं मृत्‍यु संसार के दो सबसे बड़े सच हैं। जीवन में हमेशा इससे अवगत रहना चाहिए। यह जीते जी ही अनुभव किया जा सकता है। दुर्भाग्‍य से अधिकांश मानव मौत से ठीक पूर्व ही ये समझ पाते हैं और इसी कारण संसार में अशान्ति है।  
  • सही-गलत बात का निर्णय करने के लिए जिस 'सन्‍चेतन हृदय' और 'प्रखर मस्तिष्‍क' की आवश्‍यकता होती है, वह एक 'सच्‍चे' सन्‍त के पास ही हो सकता है।
  • मानवीय सम्‍बन्‍धों की अन्‍तर्जटिलताओं व अन्‍तर्विरोधों से पीड़ित संवदेनशील व्‍यक्ति मृत्‍यु से पूर्व यदि किसी के प्रति घनघोर रुप से आसक्‍त होता है तो यह है 'प्रकृति' और दुर्भाग्‍य से इसी को मानवजाति नष्‍ट करने पर तुली हुई है।
  • गाय, बैल एवं किसान की पूजा-अर्चना सबसे पहले होनी चाहिए क्‍योंकि ये मनुष्‍य जीवन के मुख्‍य आधार हैं।
  • आत्‍मविश्‍वासी मनुष्‍य दुनिया को विश्‍वास सिखा सकता है।
  • मानव साथी मानव का उचित मान-सम्‍मान तभी कर सकता है जब वह खुद को भलीभांति समझ चुका हो। क्‍या हम सब खुद को अच्‍छी तरह से समझ सके हैं? यह प्रश्‍न सभी को स्‍वयं से अवश्‍य पूछना चाहिए और हो सके तो इसका ईमानदार उत्‍तर ही दिया जाना चाहिए।
  • ईश्‍वर का होना या न होना भक्ति की शक्ति ही तय करती है।
  • एक वयस्‍क व्‍यक्ति द्वारा स्‍वयं के साथ किया जानेवाला संवाद ही सच्‍चा और सफल होता है।
  • बड़ी बात और बड़े काम में फर्क होता है। बड़ी बात करनेवाले बड़े काम व बड़े काम करनेवाले बड़ी बात नहीं करते।
  • दूसरे को समझाने-बुझाने के लिए सभी बुदि्धमान होते हैं, पर स्‍वयं को समझा-बुझा सकनेवाले विद्वान कम ही होते हैं।
  • यदि स्‍वयं को दूसरे की दृष्टि से देखने का अवसर मिले तो यही पाएंगे कि हमारा अस्तित्‍व कुछ नहीं है। तब अहं का चकनाचूर होना अवश्‍यंभावी है।
  • हमें अपनी विचारदृष्टि को प्रतिदिन परखना चाहिए और यहां की संकीर्णता को कुछ देर के लिए अलग रख देना चाहिए। यदि यह अभ्‍यास नि‍यमित हो तो निश्चित ही एक नए जीवन का अनुभव होगा।
  • मनुष्‍य की भौतिक महत्‍वाकांक्षाएं उसके जीवन से ज्‍यादा बड़ी नहीं होनी चाहिए।
  • प्रशंसा तो दुश्‍मन भी करते हैं, पर वे उसका वाचन या प्रदर्शन नहीं करते।
  • मनुष्‍य के जीवन में किसी भी परिस्थिति में जो डर होता है वह उसके आत्‍मविश्‍वास की कमी के कारण ही होता है।
  • वस्‍तु उत्‍पादन और उपभोग प्रणाली पर केन्द्रित संसार में भ्रष्‍टाचार कभी समाप्‍त नहीं हो सकता। हां उसका स्‍तर छोटा-बड़ा अवश्‍य हो सकता है।
  • मूल्‍यहीन मूल्‍यांकनकर्त्‍ताओं द्वारा शासित राष्‍ट्र में किसी कार्य हेतु प्रसिदि्ध, लोकप्रियता, पुरस्‍कार, पदोन्‍नति की अपेक्षा मूर्खता है।
  • हमें ये तो पता होता है कि जीवन में क्‍या करना है, पर ये नहीं पता होता कि क्‍या नहीं करना। और जो नहीं करना चाहिए, जीवन का सारा जोर उसे संभालने में ही लग जाता है।
  • जीवन विडंबनाएं देखकर लगता है कि मनुष्‍य का मनुष्‍य जाति पर सबसे बड़ा उपकार यही होगा कि वह मनुष्‍य को जन्‍म ही न दे।
  • कुतर्क अंतहीन होते हैं और तर्क में वाद-विवाद की जरूरत नहीं पड़ती।
  • कुतर्की को लगता है कि उसकी बातें कुतर्क नहीं हैं, पर उसकी बात-विस्‍तार की आकांक्षा उसके लिए कुतर्कों का चयन उसके सोचे बिना ही कर लेती है।
  • अधिकारहीन मनुष्‍य को प्रवक्‍ता नहीं बनना चाहिए।
  • हमारा जीवन जिस धुरी में घूमता है, हमें उसे रचनेवाले का सम्‍मान तो करना ही पड़ेगा। और अगर यह भगवान है तो उस तक पहुंचने के लिए धार्मिक भी बनना ही पड़ेगा।
  • जब सब समझदार हैं तो यह निर्णय कौन करेगा‍ कि मूर्ख कौन है? और जब कोई मूर्ख नहीं है तो मानवीय समस्‍याएं क्‍यों हैं?
  • किसी के प्रति हमारी सच्‍ची लगन का अर्थ है कि हम जीवन को जीवनभर केवल उसके सकारात्‍मक दृष्टिकोण से ही देखें।
  • जीवन का सुख और मृत्‍यु का दुख मानव-जीवन के दो विराट पहलू हैं। वैचारिक स्‍तर पर हमेशा इनसे जुड़े रहना वैश्विक शान्ति के लिए परम आवश्‍यक है।
  • लोग अपनी हरेक बात के अच्‍छे-बुरे पक्ष से परिचित नहीं होते। यह भी कम ही होता है कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति द्वारा हर बार अच्‍छी ही बात कही जाए। इसीलिए अच्‍छी बातों के कम व बुरी बातों के अधिक प्रसार के कारण लोगों के बीच जो परस्‍पर विमर्श होता है उससे सद्भावना के बजाय मतभेद अधिक उत्‍पन्‍न होते हैं।
  • बड़े से बड़े कार्य में सफलता तब ही मिल पाती है, जब कार्यकर्त्‍ता कार्य के प्रति एकाग्रचित्‍त रहता है।
  • चारित्रिक पतन मनुष्‍य को इस योग्‍य भी नहीं छोड़ता कि वह रात को यह याद रख सके कि उसने सुबह कलेवा में क्‍या खाया था।
  • जिस प्रकार मूर्ख की गम्‍भीरता उसे सम्‍माननीय बना सकती है, उसी प्रकार विद्वान की अति विनोदप्रियता उसे निंदनीय बना सकती है।
  • आधुनिक संसार में व्‍यक्ति का नहीं उसकी सामाजिक योग्‍यता एवं आर्थिक शक्ति का ही सम्‍मान होता है। व्‍यक्ति का नि:स्‍वार्थ सम्‍मान करनेवाली पारम्‍परिक व्‍यवस्‍था कब की नष्‍ट हो चुकी है।
  • मनुष्‍य अपने जीवन में सबसे बड़ा ज्ञान मृत्‍यु के सत्‍य को याद रखकर ही प्राप्‍त कर सकता है।
  • बड़ी बातें सीखने से पहले छोटी-छोटी बातों को ध्‍यान से देखना, सुनना व उन पर मनन करना सीखना चाहिए। प्राय: इस अभ्‍यास की कमी से सच्‍चे विद्वानों की बड़ी बातों का अनुसरण नहीं हो पाता।
  • विचारों से अधिक कार्य प्रभावित करते हैं।
  • अपनी बुराई सहन करनेवालों को दूसरों की बुराई करने का अधिकार नहीं मिल सकता।
  • व्‍यतीत कभी रिक्‍त नहीं होता, बल्कि उसके ही फलस्‍वरूप वर्तमान में हमारा अस्तित्‍व है। 
  • आत्‍मविश्‍वास से तात्‍पर्य सद्भावनाओं के अनुरूप कर्मशील होने से है।
  • ब्रह्मचर्य सिद्ध करने की बात निरर्थक है क्‍योंकि ब्रह्मचारी को तो अबोध शिशु भी पहचान लेता है।
  • जीवन का संगीत सुनने के लिए एकान्‍त की सहायता अवश्‍य लेनी चाहिए।
  • क्‍या आज कोई ऐसा मनुष्‍य है, जिसे याद रहे कि वह मनुष्‍य है? यदि सच में ऐसा कोई मनुष्‍य कहीं है, तो वह इस मशीनी समय में भगवान के समान है।

Monday, May 11, 2015

कोयल बोले पुरवा डोले

कोयल सी तेरी बोली------कोयल कूके, हूक उठाए यादों की बंदूक चलाए-----कोयल बोले पुरवा डोले----जैसे कितने ही गीत होंगे कोयल की कुहूक पर। संगीत में ढलकर ये गीत लोगों के अवचेतन मन में बस गए।
इस बैसाख माह में मुझे कोयल की कुहूक अनेक बार सुनने को मिली। घर, कार्यालय या कहीं भी आते-जाते कोयल की मंद-मीठी ध्‍वनि कानों में अमृत सरीखी गिरती रही। कार्यालय में पहली बार कुहूक सुनी तो कोयल को देखने की इच्‍छा से नजरें विशाल नीम के पेड़ पर तेजी से घूम गईं। सघन पत्तियों के बीच कोयल नहीं दिखी। सहकर्मियों से जिज्ञासा प्रकट की, ''विगत वर्षों में तो कोयल की कुहूक यहां कभी नहीं सुनी। इस बार ही क्‍यों सुनाई दे रही है!!'' उत्‍तर में वे इतना ही कह पाए, ''नहीं! हर साल बोलती है। आप सुन नहीं पाते होंगे।''
मन में सोचा मेरी स्‍मृति प्रकृति के बारे में इतनी कम नहीं हो सकती। मैं अधिकांश समय प्राकृतिक घटनाओं, कार्यक्रमों के प्रति जागरूक रहता हूँ। मेरे कान क्‍यों विगत वर्षों में इस मौमस के दौरान कोयल की कुहूक नहीं सुन पाए! एकांत आकलन किया कि नहीं मैं ठीक हूँ, मेरी स्‍मृति ठीक है। वास्‍तव में पिछले वर्षों में मुझे इन दिनों कोयल की कुहूक कभी नहीं सुनाई दी। इस बार जो कोयल की कुहूक सुनाई दे रही है, वह वास्‍तव में जीवन में एक नवीन उल्‍लास, उत्‍कृष्‍ट घटना है। 
कोयल की बोली सुनना कितना आनंददायी है! काश यातायात के सभी वाहनों के हॉर्न की आवाज कोयल की बोली जैसे होती! तब वे अगर निरंतर हॉर्न बजाते तो भी कोई पीड़ा न होती। लाल-संतरी-पीले रंगों के पुष्‍पों से सुसज्जित गुलमोहर, पीले फूलों से लदे अमलतास और नीम, पीपल, जामुन आदि वृक्षों में बैठकर कोयल का प्रकृति गायन मधु बिखेरता प्रतीत होता है। ऐसे लगता कि वर्षों से एकत्रित सांसारिक सिरदर्द कर्णांगों से बाहर निकल गया।
कई बार तो मैं कोयल की अप्रतिम कुहूक सुनने पेड़ों के नीचे देर तक खड़ा हो गया। लोगों की संदेहभरी दृष्टि भांपकर समझ गया कि उन्‍हें मेरा ऐसा खड़ा होना ठीक नहीं लगा। आधुनिक कल-पुर्जों के  मनोविज्ञान में गुम  होती  दुनिया के अनुसार जीवन व्‍यतीत करते ज्‍यादातर लोगों की दृष्टि में एक मिनट भी सड़क पर खड़ा होना व्‍यर्थ है। जिस स्‍थान पर वृक्षों की हरियाली के बीच से कोयल कुहूक-कुहूक करती, वहां खड़े या उस स्‍थान से आते-जाते लोगों के लिए यह सामान्‍य बात थी। मैंने देखा, उन लोगों में से किसी ने भी कोयल की कूक सुनने और कोयल देखने की जिज्ञासा प्रकट नहीं करी। उन्‍हें तो जैसे किसी ने नकारात्‍मक रूप से आत्‍मकेन्द्रित रहने का विष पिला रखा था। जो लोग जीवन के आधारस्‍तंभ प्रकृति के प्रति इस तरह उदासीन हो जाएं, उनके बीच रहकर जीवन और मानव का अनुभव कैसे हो सकता है!!
          पिछले एक वर्ष के दौरान आई प्राकृतिक आपदाओं, विपत्तियों की बारंबारता ने ढंग से सिद्ध कर दिया है कि मानवों द्वारा धरती का अत्‍यधिक दोहन किया जा चुका है। दुर्भाग्‍य से मानव मन में यह चेतना भी शायद नहीं बची कि यदि आगे भी पृथ्‍वी का विकास के प्रयोजनार्थ ऐसा ही अतिदोहन होता रहा, तो निश्चित है कि कोयल की कुहूक और इसे सुनने की इच्‍छा रखनेवाले मानवों का अस्तित्‍व ही मिट जाएगा।
विकेश कुमार बडोला